Life Prediction / सम्पूर्ण कुण्डली फल
Life Prediction / सम्पूर्ण कुण्डली फल
संपूर्ण भविष्यफल रिपोर्ट एक ऐसा रिपोर्ट है जिसमें किसी व्यक्ति के भविष्य के विषय में संपूर्ण जानकारी दी गयी होती है। इस व्यापक जीवन रिपोर्ट द्वारा आप अपने वर्तमान भविष्यफल, मंगल दोष विश्लेषण, शनि साढ़े साती विश्लेषण, विंशोतरी दशाफल, गोचर फल, लाल किताब भविष्यफल उपाय जैसी चीज़ों के बारे में जान सकते हैं।
आज की इस भाग-दौड़ भरी ज़िन्दगी में लोगों का जीवन बेहद तनावपूर्ण है। करियर, घर-परिवार, प्रेम और पारिवारिक मामलों समेत अनेक मसले व्यक्ति को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप से प्रभावित करते रहते हैं। यदि दूसरे शब्दों में कहा जाए तो हम सभी के लिए एक शांतिपूर्ण जीवन की कल्पना लगातार मुश्किल होती जा रही है और यह सब इसलिए क्योंकि लोग लगातार अपने भविष्य को अच्छा करने की कोशिश में जुटे हुए हैं। जरा सोचिये कि यदि हमें यह पता चल जाये कि हमारा आने वाला कल कैसा होगा तो हम पहले से ही हर परिस्थिति के लिए तैयार हो जाएंगे।
यह संपूर्ण भविष्यफल रिपोर्ट आपके नक्षत्रों और ग्रहों की दशा को देख कर तैयार की जाती है जो आपकी पूरी ज़िन्दगी में ग्रहों, दोषों, दशाएं आदि का प्रभाव कब-कब होगा इन सभी बातों की जानकारी देता है। इस रिपोर्ट में तालिकाओं की मदद से आपको ग्रहों के गोचर और उनकी गति आदि के विषय में समझाया गया है।
आपकी ज़िन्दगी में तारों, ग्रहों व नक्षत्रों की चाल की कैसी रहेगी और आपके जीवन में इसका कैसा प्रभाव रहेगा, इन सभी बातों को आप हमारे संपूर्ण भविष्यफल रिपोर्ट की मदद से जान सकते हैं। कोई व्यक्ति जीवन में क्या व्यवसाय शुरू करेगा, काम-धंधे में कब वृद्धि के योग हैं और कब आमदनी बढ़ेगी, कब सेहत अच्छा रहेगा, कब बुरा रहेगा, कब विपदा आएगी तो कब खुशहाली सभी कुछ होता है इस संपूर्ण जीवन रिपोर्ट में।
भविष्यफल जानने के लाभ
मनुष्य अपने भविष्य को जानने के लिए हमेशा ही उत्सुक रहता है। हर व्यक्ति अपने भविष्य के विषय में जानना चाहता है क्योंकि इस दुनिया में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है, जिसे किसी प्रकार की कोई समस्या न हो। हम सब किसी न किसी समस्या से घिरे हुए हैं। किसी को स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानी है तो किसी को पारिवारिक, कोई बच्चा न होने से परेशान है तो वहीं किसी की शादी में देरी हो रही है। इसके अलावा भी अनेकों चिंताए सताती रहती है कि हमारे जो काम अटके हुए हैं वो कब पूरे होंगे, अच्छे दिनों की शुरुआत कब से होगी, बूरा समय कब खत्म होगा।
इन्हीं सब समस्याओं के समाधान के लिए हर इन्सान अपना भविष्य जानने की कोशिश में लगा रहता है। सबका भविष्य जानने का अपना अलग तरीका है। कोई ग्रह नक्षत्र की मदद से भविष्य बताता है तो कोई आपकी हथेली की रेखाओं को देखकर भविष्य का अंदाज़ा लगाता है। कोई मात्र चेहरा देखकर ही भविष्यवाणी कर देता है तो कोई टैरो कार्ड्स द्वारा भविष्य बताता है।
कई लोग भविष्य जानने के लिए ढोंगी पंडितो ,ज्योतिषों और सिद्ध बाबाओं के चक्कर लगाते रहते है जिसमें वे न केवल अपना पैसा बल्कि अपना समय भी बर्बाद करते हैं। इसीलिए एस्ट्रोसेज ने आप सभी लोगो के लिए इस संपूर्ण भविष्यफल रिपोर्ट की शुरुआत की जो चंद्र मिनटों के भीतर ही की हर एक जानकारी आपको मुहैया करता है।
यह सम्पूर्ण भविष्यफल रिपोर्ट हमें हमारे आने वाले कल की एक झलक प्रदान करता है। इससे हम अपने कल में झांक सकते हैं साथ ही आने वाली सभी परिस्थितियों के लिए खुद को तैयार भी कर सकते हैं।
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Monthely Horoscope / मासिक राशिफल
मासिक राशिफल / Monthly Horoscope
मासिक राशिफल का मतलब है राशि के आधार पर की गई पूरे महीने की भविष्यवाणी। इस भविष्यकथन को लोग अंग्रेजी में Monthly Horoscope भी कहते हैं। मासिक राशिफल एक व्यक्ति को राशि की मदद से उसके आने वाले 30 दिनों की जानकारी प्रदान करता है। कुछ लोग मासिक राशिफल को मासिक फलादेश भी कहते हैं। यह पूरे महीने के राशि चक्र के आधार पर व्यक्ति के भविष्य अर्थात उसके अच्छे और बुरे दिनों की गणना होती है।
मासिक राशिफल क्यों है जरूरी है ?
हमारे समाज में हर तरह के लोग रहते हैं। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो राशिफल पर विश्वास करते हैं तो वहीं कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें राशि और इनसे जुड़ी बातों पर यकीन नहीं होता है। आपको बता दें कि दैनिक राशिफल, साप्ताहिक राशिफल या फिर मासिक राशिफल एक ऐसी गणना होती है जो किसी व्यक्ति की राशि में आने वाले दिन, सप्ताह, महीने में नक्षत्रों, ग्रहों, सूर्य-चंद्र की दशा आदि को देख कर की जाती है।
राशिफल का फलादेश ज्योतिषीय गणनाओं पर निर्धारित किया जाता है, जिसमें किसी व्यक्ति के वर्तमान और भविष्य की जानकारी खगोलीय घटनाओं के आधार पर दर्शायी गयी होती है। इन खगोलीय पिंडों का गहन अध्ययन ही किसी व्यक्ति के जीवन में प्रभाव और दुष्प्रभावों को बतलाता है। जिसकी गणना करते वक़्त व्यक्ति के गोचर के ग्रहों की स्थिति को भी ध्यान में रखा जाता है। जैसे कि चन्द्रमा किस राशि में है या फिर कौन सा ग्रह किस चाल में है।
जैसा कि हम सभी जानते हैं कि एक साल में 12 महीने और एक महीने में 30 दिन होते हैं। महीने की शुरुआत से ही लोग आने वाले 30 दिनों कि प्लानिंग शुरू कर देते हैं। उन्हें इस बात कि जिज्ञासा होती है कि उनका वह महीना कैसा गुज़रेगा। ऐसे में मासिक राशिफल उनके लिए भविष्यवाणी का काम करता है।
मासिक राशिफल का लाभ
आज के परिवेश में लोग वर्तमान से ज्यादा भविष्य के बारे में सोचते हैं। लोगों को आज की चिंता नहीं होती, उन्हें यह बात परेशान करती है कि आने वाला समय आखिर कैसा होगा? मासिक राशिफल या भविष्यफल हमें हमारे पूरे महीने की आने वाली परेशानियों, स्वास्थ सम्बन्धी समस्याओं, लाभ, हानि, यात्रा, सम्पत्ति, परिवार आदि जैसी चीज़ों से जुडी जानकारी देता है। ज़रा सोचिये कि अगर किसी व्यक्ति को अगले 30 दिनों की जानकारी पहले ही हो जाये तो वह आने सारी बुरी परिस्थितियों के लिए पहले ही मानसिक तौर पर खुद को तैयार कर लेगा। साथ ही पूरी मेहनत और लगन के साथ अपने जीवन में आगे बढ़ने और अपनी कार्य को गति देने का प्रयास करेगा।
जैसा कि हम सब जानते हैं कि ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुल 12 राशियाँ होती हैं – मेष,वृष,मिथुन,कर्क,सिंह,कन्या,तुला,वृश्चिक,धनु,मकर,कुम्भ और मीन। इन सभी राशियों की अपनी कमजोरियां, ताकत, गुण, लोगों के प्रति रवैया और इच्छा होती है। ज्योतिष शास्त्र के माध्यम से किसी भी इन्सान के जन्म के समय ग्रहों की स्थिति का आंकलन कर उसकी प्राथमिकताओं, जरूरतों और कमियों आदि के बारे में अनुमान लगाया जा सकता है। राशियों की ये बुनियादी विशेषताएं हमें और बेहतर तरीके से लोगों को जानने में मदद करती है।
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Daily Horoscope / दैनिक राशिफल
दैनिक राशिफल / Daily Horoscope
राशियाँ
राशियां राशि चक्र के उन बारह बराबर भागों को कहा जाता है जिन पर ज्योतिषी आधारित है। हर राशि सूरज के क्रांतिवृत्त (ऍक्लिप्टिक) पर आने वाले एक तारामंडल से सम्बन्ध रखती है और उन दोनों का एक ही नाम होता है - जैसे की मिथुन राशी और मिथुन तारामंडल। यह बारह राशियां हैं :-
- मेष राशि
- वृष राशि
- मिथुन राशि
- कर्क राशि
- सिंह राशि
- कन्या राशि
- तुला राशि
- वृश्चिक राशि
- धनु राशि
- मकर राशि
- कुम्भ राशि
- मीन राशि
इन बारह तारा समूह ज्योतिष के हिसाब से महत्वपूर्ण हैं। यदि पृथ्वी, सूरज के केन्द्र और पृथ्वी की परिक्रमा के तल को चारो तरफ ब्रम्हाण्ड में फैलायें, तो यह ब्रम्हाण्ड में एक तरह की पेटी सी बना लेगा। इस पेटी को हम १२ बराबर भागों में बांटें तो हम देखेंगे कि इन १२ भागों में कोई न कोई तारा समूह आता है। हमारी पृथ्वी और ग्रह, सूरज के चारों तरफ घूमते हैं या इसको इस तरह से कहें कि सूरज और सारे ग्रह पृथ्वी के सापेक्ष इन १२ तारा समूहों से गुजरते हैं। यह किसी अन्य तारा समूह के साथ नहीं होता है इसलिये यह १२ महत्वपूर्ण हो गये हैं। इस तारा समूह को हमारे पूर्वजों ने कोई न कोई आकृति दे दी और इन्हे राशियां कहा जाने लगा।
चन्द्र राशि
जन्म कुण्डली में चन्द्रमा जिस राशि में स्थित होता है, वह राशि चन्द्र राशि होती है। इसे जन्म राशि के नाम से भी जाना जाता है। वैदिक ज्योतिष में सभी ग्रहों में सबसे अधिक महत्व चन्द्र को ही दिया गया है। इसे "नाम राशि" की संज्ञा भी दी जाती है। क्योंकि ज्योतिष के अनुसार बालक का नाम रखने का आधार यही चन्द्र राशि होती है। जन्म के समय चन्द्र जिस नक्षत्र में स्थित होता है। उसके चरण के वर्ण से आरम्भ होने वाला नाम व्यक्ति का जन्म राशि नाम निर्धारित करता है। आईये चन्द्र राशि को समझने का प्रयास करते हैं।
चन्द्र राशि का महत्व
चन्द्र मन के कारक ग्रह माने गये हैं। इसलिये मन को नियन्त्रित करने का कार्य चन्द्र के द्वारा किया जाता है। मन चिन्तामुक्त हो तो व्यक्ति को हर स्थान पर सुख- शान्ति का अनुभव होता है। इसके विपरीत अगर मन दु:खी हों, तो उतम से उतम भोग- विलास की वस्तुओं भी आराम नहीं दे पाती. वैसे भी वैदिक ज्योतिष में [[चन्द्र राशि, चन्द्र नक्षत्र, चन्द्र स्थित भाव को शुरु से अन्य सभी योगों की तुलना में कुछ खास ही महत्व दिया जाता है।
चन्द्र राशि के उपयोग
यूं तो ज्योतिष में नौ ग्रह है। पर व्यक्ति की जन्म राशि का स्वामी चन्द्र ही होता है। सामान्यत: दैनिक राशिफल चन्द्र राशि आधारित होता है। विवाह के समय वर- वधू की कुण्डली का मिलान करने के लिये भी जन्म राशि का प्रयोग किया जाता है।
चन्द्र राशि को इतना अधिक महत्व क्यों दिया गया है। यह जानने के लिये हमें प्राचीन काल की स्थिति को समझते हुए, वहां प्रवेश करना होगा। प्राचीन काल में बालक के जन्म समय की गणना करने संबन्धी उपकरण सरलता से उपलब्ध नहीं थें. इसलिये घंटों से अधिक दिवस को ही मुख्य माना जाता था। अब क्योंकि चन्द्र एक राशि को लगभग सवा दो दिन में बदलता है। ऎसे में चन्द्र की महत्वता बढ गई। तथा इससे लग्न की महत्वता गौण हो गई। वैसे भी अन्य सभी ग्रहों की तुलना मे चन्द्र सबसे अधिक गतिशील ग्रह है। यह व्यक्ति के जीवन की घटनाओं को अत्यधिक प्रभावित करता है।
जन्म राशि/ नाम राशि का उपयोग
जन्म राशि के अनुसार आने वाले वर्ण के आधार पर अपने निवासस्थल का नाम, आजीविका स्थल का नाम या व्यापार का नाम रखना शुभ माना जाता है। कई बार नाम के आधार पर ही वर-वधू का विवाह निश्चित कर दिया जाता है। प्राचीन काल में प्रचलित 16 संस्कारों में से जिन कुछ संस्कारों को आज भी प्रयोग में लाया जाता है। उनमें नामकरण संस्कार एक है। इस संस्कार में बालक का नाम चन्द्र राशि के नक्षत्र के वर्ण के आधार पर किया जाता है।
ज्योतिष में विश्वास रखने वाले सभी व्यक्तियों के लिये चन्द्र राशि आज के जीवन का अभिन्न अंग बन गई है। जो नामकरण संस्कार से लेकर जीवन भी किसी न किसी रूप में उसके साथ रहती है। फिर वह चाहे घर से निकलने से पहले पढा जाने वाला राशिफल ही क्यों न हों।
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Vastu Cosultant / वास्तु परामर्श
वास्तु शास्त्र / Vastu
वास्तु पुरुष की अवधारणा
संस्कृत में कहा गया है कि... गृहस्थस्य क्रियास्सर्वा न सिद्धयन्ति गृहं विना। वास्तु शास्त्र घर, प्रासाद, भवन अथवा मंदिर निर्मान करने का प्राचीन भारतीय विज्ञान है जिसे आधुनिक समय के विज्ञान आर्किटेक्चर का प्राचीन स्वरुप माना जा सकता है। जीवन में जिन वस्तुओं का हमारे दैनिक जीवन में उपयोग होता है उन वस्तुओं को किस प्रकार से रखा जाए वह भी वास्तु है वस्तु शब्द से वास्तु का निर्माण हुआ है
डिजाइन दिशात्मक संरेखण के आधार पर कर रहे हैं। यह हिंदू वास्तुकला में लागू किया जाता है, हिंदू मंदिरों के लिये और वाहनों सहित, बर्तन, फर्नीचर, मूर्तिकला, चित्रों, आदि।
दक्षिण भारत में वास्तु का नींव परंपरागत महान साधु मायन को जिम्मेदार माना जाता है और उत्तर भारत में विश्वकर्मा को जिम्मेदार माना जाता है।
वास्तुशास्त्र एवं दिशाएं
उत्तर, दक्षिण, पूरब और पश्चिम ये चार मूल दिशाएं हैं। वास्तु विज्ञान में इन चार दिशाओं के अलावा 4 विदिशाएं हैं। आकाश और पाताल को भी इसमें दिशा स्वरूप शामिल किया गया है। इस प्रकार चार दिशा, चार विदिशा और आकाश पाताल को जोड़कर इस विज्ञान में दिशाओं की संख्या कुल दस माना गया है। मूल दिशाओं के मध्य की दिशा ईशान, आग्नेय, नैऋत्य और वायव्य को विदिशा कहा गया है।
वास्तुशास्त्र में पूर्व दिशा
वास्तुशास्त्र में यह दिशा बहुत ही महत्वपूर्ण मानी गई है क्योंकि यह सूर्य के उदय होने की दिशा है। इस दिशा के स्वामी देवता इन्द्र हैं। भवन बनाते समय इस दिशा को सबसे अधिक खुला रखना चाहिए। यह सुख और समृद्धि कारक होता है। इस दिशा में वास्तुदोष होने पर घर भवन में रहने वाले लोग बीमार रहते हैं। परेशानी और चिन्ता बनी रहती हैं। उन्नति के मार्ग में भी बाधा आति है।
वास्तुशास्त्र में आग्नेय दिशा
पूर्व और दक्षिण के मध्य की दिशा को आग्नेश दिशा कहते हैं। अग्निदेव इस दिशा के स्वामी हैं। इस दिशा में वास्तुदोष होने पर घर का वातावरण अशांत और तनावपूर्ण रहता है। धन की हानि होती है। मानसिक परेशानी और चिन्ता बनी रहती है। यह दिशा शुभ होने पर भवन में रहने वाले उर्जावान और स्वास्थ रहते हैं। इस दिशा में रसोईघर का निर्माण वास्तु की दृष्टि से श्रेष्ठ होता है। अग्नि से सम्बन्धित सभी कार्य के लिए यह दिशा शुभ होता है।
वास्तुशास्त्र में दक्षिण दिशा
इस दिशा के स्वामी यम देव हैं। यह दिशा वास्तुशास्त्र में सुख और समृद्धि का प्रतीक होता है। इस दिशा को खाली नहीं रखना चाहिए। दक्षिण दिशा में वास्तु दोष होने पर मान सम्मान में कमी एवं रोजी रोजगार में परेशानी का सामना करना होता है। गृहस्वामी के निवास के लिए यह दिशा सर्वाधिक उपयुक्त होता है।
वास्तुशास्त्र में नैऋत्य दिशा
दक्षिण और पश्चिक के मध्य की दिशा को नैऋत्य दिशा कहते हैं। इस दिशा का वास्तुदोष दुर्घटना, रोग एवं मानसिक अशांति देता है। यह आचरण एवं व्यवहार को भी दूषित करता है। भवन निर्माण करते समय इस दिशा को भारी रखना चाहिए। इस दिशा का स्वामी राक्षस है। यह दिशा वास्तु दोष से मुक्त होने पर भवन में रहने वाला व्यक्ति सेहतमंद रहता है एवं उसके मान सम्मान में भी वृद्धि होती है।
वास्तुशास्त्र में ईशान दिशा
ईशान दिशा के स्वमी शिव होते है, इस दिशा में कभी भी शोचालय कभी नहीं बनना चाहिये!नलकुप, कुआ आदि इस दिशा में बनाने से जल प्रचुर मात्रा में प्राप्त होत है
विश्लेषण
वास्तु पुरुष की कल्पना भूखंड में एक ऐसे औंधे मुंह पड़े पुरुष के रूप में की जाती है, जिसमें उनका मुंह ईशान कोण व पैर नैऋत्य कोण की ओर होते हैं। उनकी भुजाएं व कंधे वायव्य कोण व अग्निकोण की ओर मुड़ी हुई रहती है। मत्स्यपुराण के अनुसार वास्तु पुरुष की एक कथा है। देवताओं और असुरों का युद्ध हो रहा था। इस युद्ध में असुरों की ओर से अंधकासुर और देवताओं की ओर से भगवान शिव युद्ध कर रहे थे। युद्ध में दोनों के पसीने की कुछ बूंदें जब भूमि पर गिरी तो एक अत्यंत बलशाली और विराट पुरुष की उत्पत्ति हुई उस विराट पुरुष नें पूरी धरती को ढक लिया उस विराट पुरुष से देवता और असुर दोनों ही भयभीत हो गए। देवताओं को लगा कि यह असुरों की ओर से कोई पुरुष है। जबकि असुरों को लगा कि यह देवताओं की तरफ से कोई नया देवता प्रकट हो गया है। इस विस्मय के कारण युद्ध थम गया और उसके बारे में जानने के लिए देवता और असुर दोनों ने उस विराट पुरुष को पकड़ कर ब्रह्मा जी के पास ले गए। उसे उनलोगों ने इस लिए पकड़ा की उसे खुद ज्ञान नहीं था कि वह कौन है क्यों कि वह अचानक उत्पन्न हुआ था उस विराट पुरुष नें उनके पकड़ने का विरोध भी नहीं किया फिर ब्रह्मलोक में ब्रह्मदेव के सामने पहुंचने पर उनलोगों नें ब्रह्मदेव से उस विराट पुरुष के बारे में बताने का आग्रह किया। ब्रह्मा जी ने उस बृहदाकार पुरुष के बारे में कहा कि यह भगवान शिव और अंधकासुर के युद्ध के दौरान उनके शरीर से गिरे पसीने की बूंदों से इस विराट पुरुष का जन्म हुआ है इसलिए आप लोग इसे धरती पुत्र भी कह सकते हैं। ब्रह्मदेव ने उस विराट पुरुष को संबोधित कर उसे अपने मानस पुत्र होने की संज्ञा दी और उसका नामकरण करते हुए कहा कि आज से तुम्हे संसार में वास्तु पुरुष के नाम से जाना जाएगा। और तुम्हे संसार के कल्याण के लिए धरती में समाहित होना पड़ेगा अर्थात धरती के अंदर वास करना होगा मैं तुम्हे वरदान देता हूँ कि जो भी कोई व्यक्ति धरती के किसी भी भू-भाग पर कोई भी भवन, नगर, तालाब, मंदिर, आदि का निर्माण कार्य तुम को ध्यान में रखकर करेगा उसको देवता कार्य की सिद्धि, संवृद्धि और सफलता प्रदान करेंगे और जो कोई निर्माण कार्य में तुम्हारा ध्यान नहीं रखेगा और अपने मन कि करेगा उसे असुर तकलीफ और अड़चने देंगे। साथ हि जो भी निर्माण कार्य के समय पूजन जैसे- भूमिपूजन, देहलीपुजन, वास्तुपूजन के दौरान जो भी होम-हवन नैवेद्य तुम्हारे नाम से चढ़ाएगा वहीं तुम्हारा भोजन होगा।
ऐसा सुनकर वह वास्तुपुरुष धरती पे आया और ब्रह्मदेव के निर्देशानुसार एक विशेष मुद्रा में धरती पर बैठ गया जिससे उसकी पीठ नैऋत्य कोण व मुख ईशान्य कोण में था इसके उपरांत वह अपने दोनों हांथो को जोड़कर पिता ब्रह्मदेव व धरतीमाता(अदिति) को नमस्कार करते हुए औंधे मुंह धरती में सामने लगा उसको इस तरह धरती में समाने में विराट होने की वजह से हो रही मुश्किलों की वजह से देवताओं व असुरों ने उसके अंगों को जगह-जगह से पकड़कर उसे धरती में सामने में उसकी मदत की । अब जिस अंग को जिस देवता व असुर नें जहां से भी पकड़ रखा था आगे उसी अंग-पद में उसका वास अथवा स्वामित्व हुआ।
देवताओं ने वास्तु पुरुष से कहा तुम जैसे भूमि पर पड़े हुए हो वैसे ही सदा पड़े रहना और तीन माह में केवल एक बार ही दिशा बदलना।
उपर्युक्त तथ्यों को देखते हुए हमे किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य वास्तु के अनुरूप ही करना चाहिए।
अगर वास्तुपुरुष की इस औंधे मुंह लेटी हुई अवस्था के अनुसार भूखंड की लंबाई और चौड़ाई को 9-9 भागों में बांटा जाए तो इस भूखंड के 81 भाग बनते हैं जिन्हें वास्तुशास्त्र में पद कहा गया है जिस पद पर जो देवता वास करते हैं उन्हीं के अनुकूल उस पद का प्रयोग करने को कहा गया है। वास्तुशास्त्र में इसे ही 81 पद वाला वास्तु पुरुष मंडल कहा जाता है।
निवास के लिए गृह निर्माण में 81 पद वाले वास्तु पुरुष मंडल का ही विन्यास और पूजन किया जाता है। समरांगण सूत्रधार के अनुसार वास्तु पुरुष मंडल में कुल 45 देवता स्थित है। जिसमे मध्य के 9 पदों पर ब्रह्मदेव स्वयं स्थित हैं।
ब्रह्म पदों के चारो ओर 6-6 पदों पर पूर्व में अर्यमा( आदित्य देव ), दक्षिण में विवस्वान( मृत्युदेव ), पश्चिम में मित्र ( हलधर ) तथा उत्तर में पृथ्वीधर ( भगवान अनंत शेषनाग ) स्थित हैं। ये मध्यस्थ देव हैं।
ठीक इसी प्रकार मध्यस्त कोणों के भी देव हैं- ईशान्य में आप( हिमालय ) और आपवत्स( भगवान शिव की अर्धांगिनी उमा ), आग्नेय में सविता ( गंगा ) एवं सावित्र( वेदमाता गायत्री ) नैऋत्य में जय( हरि इंद्र ) तथा वायव्य में राजयक्ष्मा( भगवान कार्तिकेय ) और रुद्र( भगवान महेश्वर ) जो एक-एक पदों पर स्थित हैं।
फिर वास्तुपुरुष मंडल के बाहरी 32 पदों के देव हैं – शिखी( भगवान शंकर ), पर्जन्य(वर्षा के देव वृष्टिमान), जयंत( भगवान कश्यप ), महेंद्र( देवराज इंद्र ), रवि( भगवान सूर्यदेव ), सत्य( धर्मराज ), भृश( कामदेव ), आकाश( अंतरिक्ष-नभोदेव ), अनिल( वायुदेव-मारुत ), पूषा( मातृगण ), वितथ( अधर्म ), गृहत्क्षत( बुधदेव ), यम( यमराज ), गंधर्व( पुलम- गातु ), भृंगराज व मृग( नैऋति देव), पित्र( पितृलोक के देव ), दौवारिक( भगवान नंदी , द्वारपाल), सुग्रीव( प्रजापति मनु ), पुष्पदंत( वायुदेव ), वरुण,( जलों-समुद्र के देव लोकपाल वरुण देव ), असुर( सिंहिका पुत्र राहु ), शोष( शनिश्चर ), पापयक्ष्मा( क्षय ), रोग( ज्वर ), नाग( वाशुकी ), मुख्य( भगवान विश्वकर्मा ), भल्लाट( येति, चन्द्रदेव ), सोम( भगवान कुबेर ), भुजग( भगवान शेषनाग ), अदिति( देवमाता, मतांतर से देवी लक्ष्मी ), दिति( दैत्यमाता ) हैं । इनमें से 8 अंदर के एक-एक अतिरिक्त पदों के भी अधिष्ठाता हैं ।
वास्तुपुरुष के प्रत्येक अंग-पद में स्थित देवता के अनुसार उनका सम्मान करते हुए उसी अनुरूप भवन का निर्माण, विन्यास एवं संयोजन करने की अनुमति शास्त्रों में दी गयी है। ऐसे निर्माण के फलस्वरूप वहां निवास करने वालों को सुख, सौभाग्य, आरोग्य, प्रगति व प्रसन्नता की प्राप्ति होती है।
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Muhurt Jyotish / शुभ मुहूर्त
Muhurt Jyotish / शुभ मुहूर्त
हिन्दू धर्म में मुहूर्त एक समय मापन इकाई है। वर्तमान हिन्दी भाषा में इस शब्द को किसी कार्य को आरम्भ करने की शुभ घड़ी को कहने लगे हैं।
एक मुहूर्त बराबर होता है दो घडी के, या लगभग 48 मिनट के.
अमृत/जीव मुहूर्त और ब्रह्म मुहूर्त बहुत श्रेष्ठ होते हैं ; ब्रह्म मुहूर्त सूर्योदय से पच्चीस नाड़ियां पूर्व, यानि लगभग दो घंटे पूर्व होता है। यह समय योग साधना और ध्यान लगाने के लिये सर्वोत्तम कहा गया है।
मुहूर्तों के नाम :-
| क्रमांक | समय | मुहूर्त | गुण |
|---|---|---|---|
| १ | ०६:०० - ०६:४८ | रुद्र | अशुभ |
| २ | ०६:४८ - ०७:३६ | आहि | अशुभ |
| ३ | ०७:३६ - ०८:२४ | मित्र | शुभ |
| ४ | ०८:२४ - ०९:१२ | पितॄ | अशुभ |
| ५ | ०९:१२ - १०:०० | वसु | शुभ |
| ६ | १०:०० - १०:४८ | वाराह | शुभ |
| ७ | १०:४८ - ११:३६ | विश्वेदेवा | शुभ |
| ८ | ११:३६ - १२:२४ | विधि | शुभ - सोमवार और शुक्रवार को छोड़कर |
| ९ | १२:२४ - १३:१२ | सतमुखी | शुभ |
| १० | १३:१२ - १४:०० | पुरुहूत | अशुभ |
| ११ | १४:०० - १४:४८ | वाहिनी | अशुभ |
| १२ | १४:४८ - १५:३६ | नक्तनकरा | अशुभ |
| १३ | १५:३६ - १६:२४ | वरुण | शुभ |
| १४ | १६:२४ - १७:१२ | अर्यमा | शुभ - रविवार को छोड़कर |
| १५ | १७:१२ - १८:०० | भग | अशुभ |
| १६ | १८:०० - १८:४८ | गिरीश | अशुभ |
| १७ | १८:४८ - १९:३६ | अजपाद | अशुभ |
| १८ | १९:३६ - २०:२४ | अहिर बुध्न्य | शुभ |
| १९ | २०:२४ - २१:१२ | पुष्य | शुभ |
| २० | २१:१२ - २२:०० | अश्विनी | शुभ |
| २१ | २२:०० - २२:४८ | यम | अशुभ |
| २२ | २२:४८ - २३:३६ | अग्नि | शुभ |
| २३ | २३:३६ - २४:२४ | विधातॄ | शुभ |
| २४ | २४:२४ - ०१:१२ | क्ण्ड | शुभ |
| २५ | ०१:१२ - ०२:०० | अदिति | शुभ |
| २६ | ०२:०० - ०२:४८ | जीव/अमृत | बहुत शुभ |
| २७ | ०२:४८ - ०३:३६ | विष्णु | शुभ |
| २८ | ०३:३६ - ०४:२४ | युमिगद्युति | शुभ |
| २९ | ०४:२४ - ०५:१२ | ब्रह्म | बहुत शुभ |
| ३० | ०५:१२ - ०६:०० | समुद्रम् | शुभ |
ए ए मैकडोनेल के अनुसार तैत्तरीय ब्राह्मण में १५ मुहुर्तों के नाम गिनाए गये हैं।
(१) संज्ञानं (२) विज्ञानं (३) प्रज्ञानं (४) जानद् (५) अभिजानत्
(६) संकल्पमानं (७) प्रकल्पमानम् (८) उपकल्पमानम् (९) उपकॢप्तं (१०) कॢप्तम्
(११) श्रेयो (१२) वसीय (१३) आयत् (१४) संभूतं (१५) भूतम् ।
चित्रः केतुः प्रभानाभान्त् संभान् ।
ज्योतिष्मंस्-तेजस्वानातपंस्-तपन्न्-अभितपन् ।
रोचनो रोचमानः शोभनः शोभमानः कल्याणः ।
दर्शा दृष्टा दर्शता विष्वरूपा सुर्दर्शना ।
आप्य्-आयमाणाप्यायमानाप्याया सु-नृतेरा ।
आपूर्यमाणा पूर्यमाणा पूर्यन्ती पूर्णा पौर्णमासी ।
दाता प्रदाताऽनन्दो मोदः प्रमोदः ॥ १०.१.१ ॥
शतपथ ब्राह्मण में एक दिन के पन्द्रहवें भाग (१/१५) को 'मुहूर्त' की संज्ञा दी गयी है।
षोडश संस्कारों में मुहूर्त की आवश्यकता
हिन्दू धर्म में सोलह संस्कारों (षोडश संस्कार) का उल्लेख किया जाता है जो मानव को उसके गर्भाधान संस्कार से लेकर अंत्येष्टि क्रियाक किए जाते हैं। इनमें से विवाह, यज्ञोपवीत इत्यादि संस्कार बड़े धूमधाम से मनाये जाते हैं। वर्तमान समय में सनातन धर्म या हिन्दू धर्म के अनुयायी में गर्भाधन से मृत्यु तक १६ संस्कारों होते है।
इतिहास :-
प्राचीन काल में प्रत्येक कार्य संस्कार से आरम्भ होता था। उस समय संस्कारों की संख्या भी लगभग चालीस थी। जैसे-जैसे समय बदलता गया तथा व्यस्तता बढती गई तो कुछ संस्कार स्वत: विलुप्त हो गये। इस प्रकार समयानुसार संशोधित होकर संस्कारों की संख्या निर्धारित होती गई। गौतम स्मृति में चालीस प्रकार के संस्कारों का उल्लेख है।
महर्षि अंगिरा ने इनका अंतर्भाव पच्चीस संस्कारों में किया। व्यास स्मृति में सोलह संस्कारों का वर्णन हुआ है। हमारे धर्मशास्त्रों में भी मुख्य रूप से सोलह संस्कारों की व्याख्या की गई है। इनमें पहला गर्भाधान संस्कार और मृत्यु के उपरांत अंत्येष्टि अंतिम संस्कार है। गर्भाधान के बाद पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण ये सभी संस्कार नवजात का दैवी जगत् से संबंध स्थापना के लिये किये जाते हैं।
नामकरण के बाद चूड़ाकर्म और यज्ञोपवीत संस्कार होता है। इसके बाद विवाह संस्कार होता है। यह गृहस्थ जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। हिन्दू धर्म में स्त्री और पुरुष दोनों के लिये यह सबसे बडा संस्कार है, जो जन्म-जन्मान्तर का होता है।
विभिन्न धर्मग्रंथों में संस्कारों के क्रम में थोडा-बहुत अन्तर है, लेकिन प्रचलित संस्कारों के क्रम में गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, विद्यारंभ, कर्णवेध, यज्ञोपवीत, वेदारम्भ, केशान्त, समावर्तन, विवाह तथा अन्त्येष्टि ही मान्य है।
गर्भाधान से विद्यारंभ तक के संस्कारों को गर्भ संस्कार भी कहते हैं। इनमें पहले तीन (गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन) को अन्तर्गर्भ संस्कार तथा इसके बाद के छह संस्कारों को बहिर्गर्भ संस्कार कहते हैं। गर्भ संस्कार को दोष मार्जन अथवा शोधक संस्कार भी कहा जाता है। दोष मार्जन संस्कार का तात्पर्य यह है कि शिशु के पूर्व जन्मों से आये धर्म एवं कर्म से सम्बन्धित दोषों तथा गर्भ में आई विकृतियों के मार्जन के लिये संस्कार किये जाते हैं। बाद वाले छह संस्कारों को गुणाधान संस्कार कहा जाता है।
संस्कार
१. गर्भाधान :-
हमारे शास्त्रों में मान्य सोलह संस्कारों में गर्भाधान पहला है। गृहस्थ जीवन में प्रवेश के उपरान्त प्रथम कर्त्तव्य के रूप में इस संस्कार को मान्यता दी गई है। गार्हस्थ्य जीवन का प्रमुख उद्देश्य श्रेष्ठ सन्तानोत्पत्ति है। उत्तम संतति की इच्छा रखनेवाले माता-पिता को गर्भाधान से पूर्व अपने तन और मन की पवित्रता के लिये यह संस्कार करना चाहिए। वैदिक काल में यह संस्कार अति महत्वपूर्ण समझा जाता था।
२. पुंसवन:-
गर्भस्थ शिशु के मानसिक विकास की दृष्टि से यह संस्कार उपयोगी समझा जाता है। गर्भाधान के दूसरे या तीसरे महीने में इस संस्कार को करने का विधान है। हमारे मनीषियों ने सन्तानोत्कर्ष के उद्देश्य से किये जाने वाले इस संस्कार को अनिवार्य माना है। गर्भस्थ शिशु से सम्बन्धित इस संस्कार को शुभ नक्षत्र में सम्पन्न किया जाता है। पुंसवन संस्कार का प्रयोजन स्वस्थ एवं उत्तम संतति को जन्म देना है। विशेष तिथि एवं ग्रहों की गणना के आधार पर ही गर्भधान करना उचित माना गया है।
३. सिमन्तोंनयन :-
सीमन्तोन्नयन को सीमन्तकरण अथवा सीमन्त संस्कार भी कहते हैं। सीमन्तोन्नयन का अभिप्राय है सौभाग्य संपन्न होना। गर्भपात रोकने के साथ-साथ गर्भस्थ शिशु एवं उसकी माता की रक्षा करना भी इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है। इस संस्कार के माध्यम से गर्भिणी स्त्री का मन प्रसन्न रखने के लिये सौभाग्यवती स्त्रियां गर्भवती की मांग भरती हैं। यह संस्कार गर्भ धारण के छठे अथवा आठवें महीने में होता है।
४. जातकर्म:-
नवजात शिशु के नालच्छेदन से पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है। इस दैवी जगत् से प्रत्यक्ष सम्पर्क में आनेवाले बालक को मेधा, बल एवं दीर्घायु के लिये स्वर्ण खण्ड से मधु एवं घृत वैदिक मंत्रों के उच्चारण के साथ चटाया जाता है। यह संस्कार विशेष मन्त्रों एवं विधि से किया जाता है। दो बूंद घी तथा छह बूंद शहद का सम्मिश्रण अभिमंत्रित कर चटाने के बाद पिता यज्ञ करता है तथा नौ मन्त्रों का विशेष रूप से उच्चारण के बाद बालक के बुद्धिमान, बलवान, स्वस्थ एवं दीर्घजीवी होने की प्रार्थना करता है। इसके बाद माता बालक को स्तनपान कराती है।
५. नामकरण :-
एचएचजन्म के ग्यारहवें दिन यह संस्कार होता है। हमारे धर्माचार्यो ने जन्म के दस दिन तक अशौच (सूतक) माना है। इसलिये यह संस्कार ग्यारहवें दिन करने का विधान है। महर्षि याज्ञवल्क्य का भी यही मत है, लेकिन अनेक कर्मकाण्डी विद्वान इस संस्कार को शुभ नक्षत्र अथवा शुभ दिन में करना उचित मानते हैं।
नामकरण संस्कार का सनातन धर्म में अधिक महत्व है। हमारे मनीषियों ने नाम का प्रभाव इसलिये भी अधिक बताया है क्योंकि यह व्यक्तित्व के विकास में सहायक होता है। तभी तो यह कहा गया है राम से बड़ा राम का नाम हमारे धर्म विज्ञानियों ने बहुत शोध कर नामकरण संस्कार का आविष्कार किया। ज्योतिष विज्ञान तो नाम के आधार पर ही भविष्य की रूपरेखा तैयार करता है।
६. निष्क्रमण :-
दैवी जगत् से शिशु की प्रगाढ़ता बढ़े तथा ब्रह्माजी की सृष्टि से वह अच्छी तरह परिचित होकर दीर्घकाल तक धर्म और मर्यादा की रक्षा करते हुए इस लोक का भोग करे यही इस संस्कार का मुख्य उद्दे निष्क्रमण का अभिप्राय है बाहर निकलना। इस संस्कार में शिशु को सूर्य तथा चन्द्रमा की ज्योति दिखाने का विधान है। भगवान भास्कर के तेज तथा चन्द्रमा की शीतलता से शिशु को अवगत कराना ही इसका उद्देश्य है। इसके पीछे मनीषियों की शिशु को तेजस्वी तथा विनम्र बनाने की परिकल्पना होगी। उस दिन देवी-देवताओं के दर्शन तथा उनसे शिशु के दीर्घ एवं यशस्वी जीवन के लिये आशीर्वाद ग्रहण किया जाता है। जन्म के चौथे महीने इस संस्कार को करने का विधान है। तीन माह तक शिशु का शरीर बाहरी वातावरण यथा तेज धूप, तेज हवा आदि के अनुकूल नहीं होता है इसलिये प्राय: तीन मास तक उसे बहुत सावधानी से घर में रखना चाहिए। इसके बाद धीरे-धीरे उसे बाहरी वातावरण के संपर्क में आने देना चाहिए। इस संस्कार का तात्पर्य यही है कि शिशु समाज के सम्पर्क में आकर सामाजिक परिस्थितियों से अवगत हो।
७. अन्नप्राशन :-
इस संस्कार का उद्देश्य शिशु के शारीरिक व मानसिक विकास पर ध्यान केन्द्रित करना है। अन्नप्राशन का स्पष्ट अर्थ है कि शिशु जो अब तक पेय पदार्थो विशेषकर दूध पर आधारित था अब अन्न जिसे शास्त्रों में प्राण कहा गया है उसको ग्रहण कर शारीरिक व मानसिक रूप से अपने को बलवान व प्रबुद्ध बनाए। तन और मन को सुदृढ़ बनाने में अन्न का सर्वाधिक योगदान है। शुद्ध, सात्विक एवं पौष्टिक आहार से ही तन स्वस्थ रहता है और स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन का निवास होता है। आहार शुद्ध होने पर ही अन्त:करण शुद्ध होता है तथा मन, बुद्धि, आत्मा सबका पोषण होता है। इसलिये इस संस्कार का हमारे जीवन में विशेष महत्व है।
हमारे धर्माचार्यो ने अन्नप्राशन के लिये जन्म से छठे महीने को उपयुक्त माना है। छठे मास में शुभ नक्षत्र एवं शुभ दिन देखकर यह संस्कार करना चाहिए। खीर और मिठाई से शिशु के अन्नग्रहण को शुभ माना गया है। अमृत: क्षीरभोजनम् हमारे शास्त्रों में खीर को अमृत के समान उत्तम माना गया है।
८. चूड़ाकर्म :-
चूड़ाकर्म को मुंडन संस्कार भी कहा जाता है। हमारे आचार्यो ने बालक के पहले, तीसरे या पांचवें वर्ष में इस संस्कार को करने का विधान बताया है। इस संस्कार के पीछे शुाचिता और बौद्धिक विकास की परिकल्पना हमारे मनीषियों के मन में होगी। मुंडन संस्कार का अभिप्राय है कि जन्म के समय उत्पन्न अपवित्र बालों को हटाकर बालक को प्रखर बनाना है। नौ माह तक गर्भ में रहने के कारण कई दूषित किटाणु उसके बालों में रहते हैं। मुंडन संस्कार से इन दोषों का सफाया होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस संस्कार को शुभ मुहूर्त में करने का विधान है। वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ यह संस्कार सम्पन्न होता है।
९. विद्द्यारम्भ :-
विद्यारम्भ संस्कार के क्रम के बारे में हमारे आचार्यो में मतभिन्नता है। कुछ आचार्यो का मत है कि अन्नप्राशन के बाद विद्यारम्भ संस्कार होना चाहिये तो कुछ चूड़ाकर्म के बाद इस संस्कार को उपयुक्त मानते हैं। मेरी राय में अन्नप्राशन के बाद ही शिशु बोलना शुरू करता है। इसलिये अन्नप्राशन के बाद ही विद्यारम्भ संस्कार उपयुक्त लगता है। विद्यारम्भ का अभिप्राय बालक को शिक्षा के प्रारम्भिक स्तर से परिचित कराना है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी तो बालक को वेदाध्ययन के लिये भेजने से पहले घर में अक्षर बोध कराया जाता था। माँ-बाप तथा गुरुजन पहले उसे मौखिक रूप से श्लोक, पौराणिक कथायें आदि का अभ्यास करा दिया करते थे ताकि गुरुकुल में कठिनाई न हो। हमारा शास्त्र विद्यानुरागी है। शास्त्र की उक्ति है सा विद्या या विमुक्तये अर्थात् विद्या वही है जो मुक्ति दिला सके। विद्या अथवा ज्ञान ही मनुष्य की आत्मिक उन्नति का साधन है। शुभ मुहूर्त में ही विद्यारम्भ संस्कार करना चाहिये।
१०. कर्णवेध :-
हमारे मनीषियों ने सभी संस्कारों को वैज्ञानिक कसौटी पर कसने के बाद ही प्रारम्भ किया है। कर्णवेध संस्कार का आधार बिल्कुल वैज्ञानिक है। बालक की शारीरिक व्याधि से रक्षा ही इस संस्कार का मूल उद्देश्य है। प्रकृति प्रदत्त इस शरीर के सारे अंग महत्वपूर्ण हैं। कान हमारे श्रवण द्वार हैं। कर्ण वेधन से व्याधियां दूर होती हैं तथा श्रवण शक्ति भी बढ़ती है। इसके साथ ही कानों में आभूषण हमारे सौन्दर्य बोध का परिचायक भी है।
यज्ञोपवीत के पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शुक्ल पक्ष के शुभ मुहूर्त में इस संस्कार का सम्पादन श्रेयस्कर है।
११. यज्ञोपवीत :-
यज्ञोपवीत अथवा उपनयन बौद्धिक विकास के लिये सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। धार्मिक और आधात्मिक उन्नति का इस संस्कार में पूर्णरूपेण समावेश है। हमारे मनीषियों ने इस संस्कार के माध्यम से वेदमाता गायत्री को आत्मसात करने का प्रावधान दिया है। आधुनिक युग में भी गायत्री मंत्र पर विशेष शोध हो चुका है। गायत्री सर्वाधिक शक्तिशाली मंत्र है।
यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं अर्थात् यज्ञोपवीत जिसे जनेऊ भी कहा जाता है अत्यन्त पवित्र है। प्रजापति ने स्वाभाविक रूप से इसका निर्माण किया है। यह आयु को बढ़ानेवाला, बल और तेज प्रदान करनेवाला है। इस संस्कार के बारे में हमारे धर्मशास्त्रों में विशेष उल्लेख है। यज्ञोपवीत धारण का वैज्ञानिक महत्व भी है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी उस समय प्राय: आठ वर्ष की उम्र में यज्ञोपवीत संस्कार सम्पन्न हो जाता था। इसके बाद बालक विशेष अध्ययन के लिये गुरुकुल जाता था। यज्ञोपवीत से ही बालक को ब्रह्मचर्य की दीक्षा दी जाती थी जिसका पालन गृहस्थाश्रम में आने से पूर्व तक किया जाता था। इस संस्कार का उद्देश्य संयमित जीवन के साथ आत्मिक विकास में रत रहने के लिये बालक को प्रेरित करना है।
१२. वेदारम्भ :-
ज्ञानार्जन से सम्बन्धित है यह संस्कार। वेद का अर्थ होता है ज्ञान और वेदारम्भ के माध्यम से बालक अब ज्ञान को अपने अन्दर समाविष्ट करना शुरू करे यही अभिप्राय है इस संस्कार का। शास्त्रों में ज्ञान से बढ़कर दूसरा कोई प्रकाश नहीं समझा गया है। स्पष्ट है कि प्राचीन काल में यह संस्कार मनुष्य के जीवन में विशेष महत्व रखता था। यज्ञोपवीत के बाद बालकों को वेदों का अध्ययन एवं विशिष्ट ज्ञान से परिचित होने के लिये योग्य आचार्यो के पास गुरुकुलों में भेजा जाता था। वेदारम्भ से पहले आचार्य अपने शिष्यों को ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने एवं संयमित जीवन जीने की प्रतिज्ञा कराते थे तथा उसकी परीक्षा लेने के बाद ही वेदाध्ययन कराते थे। असंयमित जीवन जीने वाले वेदाध्ययन के अधिकारी नहीं माने जाते थे। हमारे चारों वेद ज्ञान के अक्षुण्ण भंडार हैं। इस संस्कार को जन्म से 5वे या 7 वे वर्ष में किया जाता है। अधिक प्रामाणिक 5 वाँ वर्ष माना जाता है। यह संस्कार प्रायः वसन्त पंचमी को किया जाता है।
१३. केशांत :-
गुरुकुल में वेदाध्ययन पूर्ण कर लेने पर आचार्य के समक्ष यह संस्कार सम्पन्न किया जाता था। वस्तुत: यह संस्कार गुरुकुल से विदाई लेने तथा गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का उपक्रम है। वेद-पुराणों एवं विभिन्न विषयों में पारंगत होने के बाद ब्रह्मचारी के समावर्तन संस्कार के पूर्व बालों की सफाई की जाती थी तथा उसे स्नान कराकर स्नातक की उपाधि दी जाती थी। केशान्त संस्कार शुभ मुहूर्त में किया जाता था।
१४. समावर्तन :-
गुरुकुल से विदाई लेने से पूर्व शिष्य का समावर्तन संस्कार होता था। इस संस्कार से पूर्व ब्रह्मचारी का केशान्त संस्कार होता था और फिर उसे स्नान कराया जाता था। यह स्नान समावर्तन संस्कार के तहत होता था। इसमें सुगन्धित पदार्थो एवं औषधादि युक्त जल से भरे हुए वेदी के उत्तर भाग में आठ घड़ों के जल से स्नान करने का विधान है। यह स्नान विशेष मन्त्रोच्चारण के साथ होता था। इसके बाद ब्रह्मचारी मेखला व दण्ड को छोड़ देता था जिसे यज्ञोपवीत के समय धारण कराया जाता था। इस संस्कार के बाद उसे विद्या स्नातक की उपाधि आचार्य देते थे। इस उपाधि से वह सगर्व गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का अधिकारी समझा जाता था। सुन्दर वस्त्र व आभूषण धारण करता था तथा आचार्यो एवं गुरुजनों से आशीर्वाद ग्रहण कर अपने घर के लिये विदा होता था।
१५. विवाह :-
प्राचीन काल से ही स्त्री और पुरुष दोनों के लिये यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। यज्ञोपवीत से समावर्तन संस्कार तक ब्रह्मचर्य व्रत के पालन का हमारे शास्त्रों में विधान है। वेदाध्ययन के बाद जब युवक में सामाजिक परम्परा निर्वाह करने की क्षमता व परिपक्वता आ जाती थी तो उसे गृर्हस्थ्य धर्म में प्रवेश कराया जाता था। लगभग पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का व्रत का पालन करने के बाद युवक परिणय सूत्र में बंधता था।
हमारे शास्त्रों में आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख है- ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्रजापत्य, आसुर, गन्धर्व, राक्षस एवं पैशाच। वैदिक काल में ये सभी प्रथाएं प्रचलित थीं। समय के अनुसार इनका स्वरूप बदलता गया। वैदिक काल से पूर्व जब हमारा समाज संगठित नहीं था तो उस समय उच्छृंखल यौनाचार था। हमारे मनीषियों ने इस उच्छृंखलता को समाप्त करने के लिये विवाह संस्कार की स्थापना करके समाज को संगठित एवं नियमबद्ध करने का प्रयास किया। आज उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है कि हमारा समाज सभ्य और सुसज्जित है।
१६. अंत्येष्टि:-
अन्त्येष्टि को अंतिम अथवा अग्नि परिग्रह संस्कार भी कहा जाता है। आत्मा में अग्नि का आधान करना ही अग्नि परिग्रह है। धर्म शास्त्रों की मान्यता है कि मृत शरीर की विधिवत् क्रिया करने से जीव की अतृप्त वासनायें शान्त हो जाती हैं। हमारे शास्त्रों में बहुत ही सहज ढंग से इहलोक और परलोक की परिकल्पना की गयी है। जब तक जीव शरीर धारण कर इहलोक में निवास करता है तो वह विभिन्न कर्मो से बंधा रहता है। प्राण छूटने पर वह इस लोक को छोड़ देता है। उसके बाद की परिकल्पना में विभिन्न लोकों के अलावा मोक्ष या निर्वाण है। मनुष्य अपने कर्मो के अनुसार फल भोगता है। इसी परिकल्पना के तहत मृत देह की विधिवत क्रिया होती है।
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Pooja / यज्ञ - अनुष्ठान
यह 30 बातें जो हर पूजा-पाठ करने वाले व्यक्ति को पता होना चाहिए.......
शास्त्रों में बांस की लकड़ी जलाना मना है फिर भी लोग अगरबत्ती जलाते हैं। यह बांस की बनी होती है। अगरबत्ती जलाने से पितृदोष लगता है। शास्त्रों में पूजन विधान में कहीं भी अगरबत्ती का उल्लेख नहीं मिलता सब जगह धुप ही लिखा हुआ मिलता है। अगरबत्ती केमिकल से बनाई जाती है भला केमिकल या बांस जलने से भगवान खुश कैसे होंगे?
पूजा साधना करते समय बहुत सी ऐसी बातें हैं जिन पर सामान्यतः हमारा ध्यान नहीं जाता है लेकिन पूजा साधना की दृष्टि से यह बातें अति महत्वपूर्ण हैं...
1. गणेशजी को तुलसी का पत्र छोड़कर सब पत्र प्रिय हैं।
भैरव की पूजा में तुलसी स्वीकार्य नहीं है।
2. कुंद का पुष्प शिव को माघ महीने को छोड़कर निषेध है।
3. बिना स्नान किये जो तुलसी पत्र जो तोड़ता है उसे देवता स्वीकार नहीं करते।
4. रविवार को दूर्वा नहीं तोड़नी चाहिए।
5. केतकी पुष्प शिव को नहीं चढ़ाना चाहिए।
6. केतकी पुष्प से कार्तिक माह में विष्णु की पूजा अवश्य करें।
7. देवताओं के सामने प्रज्जवलित दीप को बुझाना नहीं चाहिए।
8. शालिग्राम का आवाह्न तथा विसर्जन नहीं होता।
9. जो मूर्ति स्थापित हो उसमें आवाहन और विसर्जन नहीं होता।
10. तुलसीपत्र को मध्यान्ह के बाद ग्रहण न करें।
11. पूजा करते समय यदि गुरुदेव,ज्येष्ठ व्यक्ति या पूज्य व्यक्ति आ जाए तो उनको उठ कर प्रणाम कर उनकी आज्ञा से शेष कर्म को समाप्त करें।
12. मिट्टी की मूर्ति का आवाहन और विसर्जन होता है और अंत में शास्त्रीयविधि से गंगा प्रवाह भी किया जाता है।
13. कमल को पांच रात,बिल्वपत्र को दस रात और तुलसी को ग्यारह रात बाद शुद्ध करके पूजन के कार्य में लिया जा सकता है।
14. पंचामृत में यदि सब वस्तु प्राप्त न हो सके तो केवल दुग्ध से स्नान कराने मात्र से पंचामृतजन्य फल जाता है।
15. शालिग्राम पर अक्षत नहीं चढ़ता। लाल रंग मिश्रित चावल चढ़ाया जा सकता है।
16. हाथ में धारण किये पुष्प, तांबे के पात्र में चन्दन और चर्म पात्र में गंगाजल अपवित्र हो जाते हैं।
17. पिघला हुआ घी और पतला चन्दन नहीं चढ़ाना चाहिए।
18. दीपक से दीपक को जलाने से प्राणी दरिद्र और रोगी होता है। दक्षिणाभिमुख दीपक को न रखें।
देवी के बाएं और दाहिने दीपक रखें। दीपक से अगरबत्ती जलाना भी दरिद्रता का कारक होता है।
19. द्वादशी, संक्रांति, रविवार, पक्षान्त और संध्याकाल में तुलसीपत्र न तोड़ें।
20. प्रतिदिन की पूजा में सफलता के लिए दक्षिणा अवश्य चढ़ाएं।
21. आसन, शयन, दान, भोजन, वस्त्र संग्रह, विवाद और विवाह के समयों पर छींक शुभ मानी गई है।
22. जो मलिन वस्त्र पहनकर, मूषक आदि के काटे वस्त्र, केशादि बाल कर्तन युक्त और मुख दुर्गन्ध युक्त हो, जप आदि करता है उसे देवता नाश कर देते हैं।
23. मिट्टी, गोबर को निशा में और प्रदोषकाल में गोमूत्र को ग्रहण न करें।
24. मूर्ति स्नान में मूर्ति को अंगूठे से न रगड़ें।
25. पीपल को नित्य नमस्कार पूर्वाह्न के पश्चात् दोपहर में ही करना चाहिए। इसके बाद न करें।
26. जहां अपूज्यों की पूजा होती है और विद्वानों का अनादर होता है, उस स्थान पर दुर्भिक्ष, मरण और भय उत्पन्न होता है।
27. पौष मास की शुक्ल दशमी तिथि, चैत्र की शुक्ल पंचमी और श्रावण की पूर्णिमा तिथि को लक्ष्मी प्राप्ति के लिए लक्ष्मी का पूजन करें।
28. कृष्णपक्ष में, रिक्तिका तिथि में, श्रवणादी नक्षत्र में लक्ष्मी की पूजा न करें।
29. अपराह्नकाल में, रात्रि में, कृष्ण पक्ष में, द्वादशी तिथि में और अष्टमी को लक्ष्मी का पूजन प्रारम्भ न करें।
30. मंडप के नव भाग होते हैं, वे सब बराबर-बराबर के होते हैं अर्थात् मंडप सब तरफ से चतुरासन होता है, अर्थात् टेढ़ा नहीं होता। जिस कुंड की श्रृंगार द्वारा रचना नहीं होती वह यजमान का नाश करता है।
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Palmistry / हस्तरेखा
Palmistry / हस्तरेखा शास्त्र
हस्तरेखा शास्त्र या काइरमैन्सी (जिसेकेरोमन्सी ऐसे भी लिखा जाता है, जो यूनानी शब्द चेइर (cheir) (χειρ) "हाथ" और मंटिया (manteia) (μαντεία) (अनुमानसे) बना है हथेली को पढ़कर लक्षण का वर्णन और भविष्य बताने की कला है जिसे हस्तरेखा अध्ययन या हस्तरेखा शास्त्र भी कहा जाता है। इस कला का प्रयोग कई सांस्कृतिक विविधताओं के साथ दुनिया भर में देखा जाता है। जो हस्तरेखा पढ़ते हैं, उन्हें आम तौर पर हस्तरेखाविद्, हथेली पढ़ने वाला, हाथ पढ़ने वाला, हस्तरेखा विश्लेषक या हस्तरेखा शास्त्री भी कहा जाता है।
तकनीकें
आदमी के दाहिने हाथ की हथेली
हस्तरेखा शास्त्र में हाथ व्यक्ति की हथेली को "पढ़कर" उसके चरित्र या भविष्य के जीवन का मूल्यांकन किया जाता है। विभिन्न "लाइनों" ("दिल की रेखा", "जीवन रेखा", आदि) और "उठान" या (उभार) (हस्तरेखा शास्त्र), को पढ़कर अनुमानत: उनके संबद्ध आकार, गुण और अंतरशाखाओं के संबंध में सुझाव दिये जाते हैं। कुछ रिवाजों में हस्तरेखा पढ़ने वाले उंगलियों, नाखूनों, उंगलियों के निशान और व्यक्ति की त्वचा की रेखाओं, त्वचा की बुनावट व रंग, आकार, हथेली के आकार और हाथ का लचीलापन भी देखते हैं।
एक हस्तरेखाविद् आमतौर पर व्यक्ति के 'प्रमुख हाथ' (जिससे वह लिखता है/लिखती है या जिसका सबसे ज्यादा उपयोग किया जाता है) (जो कभी-कभी सचेत मन का प्रतिनिधित्व करता है और दूसरा हाथ अवचेतन का संकेत करता है). हस्तरेखा विज्ञान की कुछ परंपराओं में दूसरे हाथ को वंशानुगत या परिवार के लक्षणों को धारण किया हुआ या हस्तरेखाविद् के ब्रह्माण्ड संबंधी विश्वासों पर आधारित माना जाता है, जिससे अतीत के जीवन या पूर्व जन्म की शर्तों के बारे में जानकारी मिलती है।
"शास्त्रीय" हस्तरेखा शास्त्र के लिए बुनियादी ढांचे (जो सबसे व्यापक रूप से सिखाया जाता है और परंपरागत रूप से प्रचलित है) की जड़ यूनानी पौराणिक कथाओं में निहित हैं। हथेली और उंगलियों का प्रत्येक क्षेत्र एक देवी या देवता से संबंधित है और उस क्षेत्र की विशेषताएं विषय के इसी पहलू की प्रकृति का संकेत है। उदाहरण के लिए, अनामिका अपोलो यूनानी देवता के साथ जुड़ी़ है; अंगूठी वाली इस उंगली की विशेषताएं कला, संगीत, सौंदर्यशास्त्र, शोहरत, धन और सद्भाव सं संबद्ध विषयों की विवेचना के दौरान देखीं जाती हैं।
बाएं और दाएं हाथ का महत्व
यद्यपि इस बात पर बहस होती रही है कि कौन सा हाथ पढ़ना बेहतर है, पर दोनों का अपना महत्व है। यह रिवाज है कि बांया हाथ व्यक्ति की संभावनाओं को प्रदर्शित करता है और दाहिना सही व्यक्तित्व का प्रदर्शक होता है। कुछ का कहना है कि महत्व इस बात का है कि कौन सा हाथ देखा जाता है। "दाहिने हाथ से भविष्य और बाएं से अतीत देखा जाता है।" "बायां हाथ बताता है कि हम क्या-क्या लेकर पैदा हुए हैं और दाहिना दिखाता है कि हमने इसे क्या बनाया है।" "दाहिना हाथ पुरुषों का पढ़ा जाता है, जबकि महिलाओं का बायां हाथ पढ़ा जाता है।" "बांया हाथ बताता है कि ईश्वर ने आपको क्या दिया है और दायां बताता है कि आपको इस संबंध में क्या करना है।"
लेकिन इन सब कहने की बातें हैं, वृत्ति और अनुभव ही आपको बेहतर ढंग से बतायेगा कि आखिर में कौन सा हाथ पढ़ना ठीक रहेगा.
- वाम हाथ को दाहिने मस्तिष्क द्वारा नियंत्रित होने के लिए छोड़ दें, (नमूने की पहचान, संबंधों की समझ-बूझ) जिससे व्यक्ति की आंतरिक खासियतों, उसकी प्रकृति, आत्म, स्त्रैण गुण और समस्याओं के निदान का सोच प्रतिबिंबित होता है। इसे एक व्यक्ति के आध्यात्मिक और व्यक्तिगत विकास का एक हिस्सा माना जा सकता है। यह व्यक्तित्व का "स्त्रैण" हिस्सा (स्त्रैण और ग्रहणशील) है।
- इसके विपरीत दाहिना हाथ बाईं मस्तिष्क (तर्क, बुद्धि और भाषा) द्वारा नियंत्रित होता है, जो बाहरी व्यक्तित्व, आत्म उद्देश्य, सामाजिक माहौल का प्रभाव, शिक्षा और अनुभव को प्रतिबिंबित करता है। यह रैखिक सोच का प्रतिनिधित्व करता है। यह व्यक्तित्व के "स्त्रैण" पहलू (पुरुष और जावक) से मेल खाता है।
हाथ का आकार
हस्तरेखा शास्त्र और उन्हें पढ़ने के प्रकार के आधार पर हस्तरेखाविद् हथेली की आकृति और उंगलियों की लाइनों, त्वचा के रंग और बुनावट, नाखूनों की बनावट, हथेली और उंगलियों की अनुपातिक आकार, पोरों की प्रमुखता और हाथ की कई अन्य खासियतों को देख सकते हैं।
हस्तरेखा शास्त्र की अधिकांश धाराओं में हाथ की आकृतियों को 4 या 10 प्रमुख शास्त्रीय प्रकारों में विभाजित किया जाता है और कभी कभी इसके लिए शास्त्रीय तत्वों या विशेषताओं का सहारा भी लिया जाता है। हाथ का आकार संकेतित प्रकार के चरित्र के लक्षणों (यानि, एक "अग्नि हाथ" उच्च ऊर्जा, रचनात्मकता, चिड़चिड़ापन, महत्वाकांक्षा, आदि - सभी गुणों को अग्नि के शास्त्रीय तत्व से संबंधित माना जाता है।)
हालांकि भिन्न-भिन्न रूपों के बावजूद सबसे आम वर्गीकरण ही आधुनिक हस्तरेखाविद् प्रयोग करते हैं।
- 'पृथ्वी' हाथ की पहचान आम तौर पर चौड़ी, वर्गाकार हथेलियों और उंगलियों या मोटी या खुरदरी त्वचा, लाल रंग के तौर पर होती है कलाई से हथेली की उंगलियों के आखिरी हिस्से तक की हथेली की लंबाई आमतौर पर हथेली के सबसे चौड़े हिस्से की चौड़ाई से कम होती है और आम तौर पर उंगलियों की लंबाई के बराबर होती है।
- 'वायु' हाथ में वर्गाकार या आयताकार हथेली व लंबी उंगलियां होती हैं और साथ ही साथ कभी-कभी उभरे हुए पोर, छोटे अंगूठे और अक्सर त्वचा सूखी होती है। कलाई से हथेली की उंगलियों के नीचे करने के लिए लंबाई आमतौर पर उंगलियों की लंबाई से कम है।
- 'जल' हाथ देखने में छोटे होते हैं और कभी-कभी अंडाकार हथेली वाले, लंबी व लचीली उंगलियों वाले होते हैं। कलाई से हथेली की उंगलियों के आखिरी हिस्से तक की हथेली की लंबाई आमतौर पर हथेली के सबसे चौड़े हिस्से की चौड़ाई से कम होती है और आम तौर पर उंगलियों की लंबाई के बराबर होती है।
- 'अग्नि' हाथ में चौकोर या आयताकार हथेली, लाल या गुलाबी त्वचा और उंगलियां छोटी होती हैं। कलाई से हथेली की उंगलियों के आखिरी हिस्से तक की हथेली की लंबाई आमतौर पर उंगलियों की लंबाई से बड़ी होती है।
स्वयं अपनी हथेली में प्रभुत्व वाले तत्व तथा प्रकृति निर्धारित करना सहज है। हाथ के आकार के विश्लेषण में रेखाओं की संख्या और पंक्तियों की गुणवत्ता भी शामिल की जा सकती है। हस्तरेखा शास्त्र की कुछ परंपराओं में, पृथ्वी और जल हाथों में कम और गहरी रेखाएं होती हैं, जबकि वायु और अग्नि हाथ में और अधिक रेखाएं दिख सकती हैं, जिनमें कम स्पष्ट परिभाषा होती है।
1 हस्तकला में हाथ की रेखाओं 1: जीवन रेखा - 2: मस्तिष्क रेखा - 3: दिल की रेखा - 4: सूचक और मध्यम उंगलियों के बीच के कटिसूत्र वीनस - 5: सूर्य रेखा - 6: बुध रेखा - 7: भाग्य रेखा
लगभग सभी हाथों में तीन रेखाएं पाई जाती हैं और आम तौर पर हस्तरेखाविद् इन पर सबसे ज्यादा जोर देते हैं।
- बड़ी रेखाओं में हृदय रेखा को हस्तरेखाविद् पहले जांचता है। यह हथेली के ऊपरी हिस्से और उंगलियों के नीचे होती है। कुछ परंपराओं में, यह रेखा छोटी उंगली के नीचे हथेली के किनारे से और अंगूठे की तरु पूरी हथेली तक पढ़ी जाती है। दूसरों में, यह उंगलियों के नीचे शुरू होती है और हथेली के बाहर के किनारे की ओर बढ़ती देखी जाती है। हस्तरेखाविद् इस पंक्ति की व्याख्या दिल के मामलों के संबंध में करते हैं, जिसमें शारीरिक और लाक्षणिक दोनों शामिल होते हैं और विश्वास किया जाता है कि दिल की सेहत के विभिन्न पहलुओं के अलावा यह भावनात्मक स्थिरता, रुमानी दृष्टिकोण, अवसाद व सामाजिक व्यवहार प्रदार्शित करती हैं।
- हस्तरेखाविद् द्वारा की पहचान की जाने वाली अगली रेखा मस्तिष्क रेखा होती है। यह रेखा तर्जनी उंगली के नीचे से शुरू होकर हथेली होते हुए बाहर के किनारे की ओर बढ़ती है। अक्सर मस्तिष्क रेखा शुरुआत में जीवन रेखा के साथ जुड़ी होती है (नीचे देखें). हस्तरेखाविद् आम तौर पर इस रेखा की व्याख्या व्यक्ति के मन के प्रतिनिधि कारकों के रूप में करते हैं और जिस तरह से यह काम करती है, उनमें सीखने की शैली, संचार शैली, बौद्धिकता और ज्ञान की पिपासा भी शामिल होती है। माना जाता है कि यह सूचना के प्रति रचनात्मक या विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण की प्राथमिकता (यानी, दाहिना दिमाग या बांया दिमाग) का संकेतक होती है।
- अंत में, हस्तरेखाविद् संभवत: सबसे विवादास्पद रेखा-जीवनरेखा को देखते हैं।
यह रेखा अंगूठे के ऊपर हथेली के किनारे से निकलती है और कलाई की दिशा में मेहराब की शक्ल में बढ़ती है। माना जाता है कि यह रेखा व्यक्ति की ऊर्जा और शक्ति, शारीरिक स्वास्थ्य और आम खुशहाली का प्रतिनिधित्व करती है। ऐसा भी माना जाता है कि जीवन रेखा दुर्घटनाओं, शारीरिक चोट, पुनर्स्थापन सहित जीवन में आने वाले बदलावों को प्रतिबिंबित करती है। आम धारणा के विपरीत, आधुनिक हस्तरेखाविद् आम तौर पर यह विश्वास नहीं करते कि एक व्यक्ति की जीवन रेखा की लंबाई के व्यक्ति की उम्र से जुड़ी हुई है।
अतिरिक्त मुख्य रेखाओं या रूपों में शामिल हैं:
- एक बन्दर रेखा (क्रीज) या दिल और मुख्य रेखा का मिलनस्थल का भावनात्मक और तार्किक प्रकृति दोनों के अध्ययन में अकेले इस रेखा का खास महत्व है। इस अजीब रेखा को सिर और दिल की रेखा का संयोजन माना जाता है और ऐसे हाथ को बाकी हाथों से अलग चिह्नित किया जाता है।
हस्तरेखाशास्त्र के अनुसार, यह रेखा एक व्यक्ति को उद्देश्य की तीव्रता या किसी उद्देश्य के प्रति एकाग्रता प्रदान करती है, जिसका स्वभाव हाथ पर इस रेखा की सही स्थिति और इससे निकलनेवाली किन्हीं शाखाओं से निर्धारित होती है, जो एक सामान्य मामला होता है। उन हाथों में, जिनमें ऐसी रेखा बिना किसी शाखा के एकल चिह्न के रूप में मौजूद होती है, वह अत्यंत गहन प्रकृति की ओर संकेत करती है और व्यक्तियों की विशेष देखभाल की जरूरत होती है। इस रेखा की सामान्य स्थिति सबसे बड़ी उंगली के नीचे शुरू होती है और सामान्य रूप से वहां समाप्त होती है, जहां दिल की रेखा छोटी उंगली के नीचे हाथ के किनारे खत्म होती à
